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जानें महाकाल मंदिर का इतिहास,जहां मौत को जीतने गया था विकास दुबे

जानें महाकाल मंदिर का इतिहास,जहां मौत को जीतने गया था विकास दुबे

नई दिल्ली: कानपुर शूटआउट के मोस्टवॉन्टेड विकास दुबे को मध्य प्रदेश पुलिस ने उस वक्त गिरफ्तार किया, जब वह उज्जैन के महाकाल मंदिर दर्शन के लिए गया था. आइए जानते हैं इस मंदिर का इतिहास, जहां मृत्यु पर विजय की आस्था लेकर जाते हैं भक्त.

महाकाल मंदिर के पौराणिक इतिहास की बात करें तो महाकालेश्वर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है. मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित, महाकालेश्वर भगवान का प्रमुख मंदिर है. भारत के प्रमुख देवस्थानों में श्री महाकालेश्वर का मन्दिर अपना विशेष स्थान है. भगवान महाकाल काल के भी अधिष्ठाता देव रहे हैं. पुराणों के अनुसार वे भूतभावन मृत्युंजय हैं, सनातन देवाधिदेव हैं.उज्जैन का प्राचीन नाम उज्जयिनी है. उज्जयि‍नी भगवान् श्रीकृष्ण की शिक्षास्थली भी रही. वहीं ज्योतिर्लिंग महाकाल इस नगर की गरिमा बढ़ाते हैं. इसके आकाश में तारक लिंग है, पाताल में हाटकेश्वर लिंग है और पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है. जहां लाखोंलाख लोग अकाल मौत पर विजय पाने की आस्था के साथ जाते हैं. शायद अपराधी विकास दुबे भी यहां इसी मान्यता के साथ पहुंचा था. पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का खूबसूरत वर्णन मिलता है. स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी महत्ता है.

ऐसी मान्यता है कि महाकाल के दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है. महाकवि कालिदास ने मेघदूत में उज्जयिनी की चर्चा करते हुए इस मंदिर की प्रशंसा की है. मंदिर में प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती में हजारों लोग हिस्सा लेते हैं. ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार साल 1235 में तत्कालीन शासक इल्तुत्मिश ने इस प्राचीन मंदिर का विध्वंस किया था. इसके बाद से यहां जो भी शासक रहे, उन्होंने इस मंदिर के जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया.इतिहास से पता चलता है कि उज्जैन में साल 1107 से 1728 ई. तक यवनों का शासन था. इनके शासनकाल में अवंति की लगभग 4500 वर्षों में स्थापित हिन्दुओं की प्राचीन धार्मिक परंपराएं प्राय: नष्ट हो चुकी थीं. लेकिन 1690 ई. में मराठों ने मालवा क्षेत्र में आक्रमण कर दिया. 29 नवंबर 1728 को मराठा शासकों ने मालवा क्षेत्र में अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया.

मंदिर एक परकोटे के भीतर स्थित है. गर्भगृह तक पहुंचने के लिए एक सीढ़ीदार रास्ता है. इसके ठीक उपर एक दूसरा कक्ष है जिसमें ओंकारेश्वर शिवलिंग स्थापित है. मंदिर का क्षेत्रफल 10.77 x 10.77 वर्गमीटर और ऊंचाई 28.71 मीटर है. महाशिवरात्रि एवं श्रावण मास में हर सोमवार को इस मंदिर में अपार भीड़ होती है.मंदिर से लगा एक छोटा-सा जलस्रोत है जिसे कोटितीर्थ कहा जाता है. ऐसी मान्यता है कि इल्तुत्मिश ने जब मंदिर को तुड़वाया तो शिवलिंग को इसी कोटितीर्थ में फिंकवा दिया था. बाद में इसकी पुनर्प्रतिष्ठा कराई गई. सन 1968 के सिंहस्थ महापर्व के पूर्व मुख्य द्वार का विस्तार कर सुसज्जित कर लिया गया था. इसके अलावा निकासी के लिए एक अन्य द्वार का निर्माण भी कराया गया था. लेकिन दर्शनार्थियों की अपार भीड़ को ध्यान में रखते हुए बिड़ला उद्योग समूह ने 1980 में सिंहस्थ के पूर्व एक विशाल सभा मंडप का निर्माण कराया.

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